Friday, April 08, 2005

पास रक्खेगी नहीं

पास रक्खेगी नहीं सब कुछ लुटायेगी नदी
शंख शीपी रेत पानी जो भी लाएगी नदी

आज है कल को कहीं यदि सूख जाएगी नदी
होठ छूने को किसी का छटपटाएगी नदी

बैठना फुरसत से दो पल पास जाकर तुम कभी
देखना अपनी कहानी खुद सुनाएगी नदी

साथ है कुछ दूर तक ही फिर सभी को छोड़कर
खुद समन्दर में किसी दिन डूब जाएगी नदी

हमने वर्षों विष पिलाकर आजमाया है जिसे
अब हमें भी विष पिलाकर आजमाएगी नदी
–कमलेश भट्ट कमल

3 comments:

Vijay Thakur said...

बहुत ख़ूब!

Jitendra Chaudhary said...

वाह वाह!
कमलेश भाई,
मजा आ गया,
सबसे पहले तो हिन्दी ब्लाग जगत मे पदार्पण करने के लिये हार्दिक स्वागत
आपकी रचना बहुत ही अच्छी है.

Ravi Bahaar said...

kamlesh ji aaj aap ka blog dekha dili khushi hui. plz visit me on

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