Monday, October 02, 2006

भले ही मुल्क के (ग़ज़ल)

भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों
किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों।

तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन
धुआँ हो, चिमनियाँ हों, फूल कम हों, तितलियाँ कम हों।

फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक
जरूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम हों।

यही जो बेटियाँ हैं ये ही आखिर कल की माँए हैं
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।

दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौका
दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम हों।

अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर
तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।

-कमलेश भट्ट कमल

8 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

दिल को छू गई आपकी गजल ।

Pratyaksha said...

वाह ! बहुत बढिया

Udan Tashtari said...

"यही जो बेटियाँ हैं ये ही आखिर कल की माँए हैं
मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।"

--बहुत खुब, कमल जी.

Raviratlami said...

एक बेहतरीन गजल

Manish said...

वाह ! जबरदस्त , हर एक शेर दमदार है ।

Anonymous said...

आपकी गज़ले तो जादुई असर करती हॆ!
सुगन्धा जयपुर

Anil Sinha said...

वाह। :-)

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Kamal ji, aaj pahli baar aapke blog par aaya hoon. Dekh kar achchha laga. Badhaayi sweekaaren.