Friday, July 22, 2011

मन नहीं बदले अगर

मन नहीं बदले अगर तो सिर्फ तन से क्या ?
आये दिन के कीर्तन से या भजन से क्या ?

जो उजाला या तपिश कुछ भी न दे जाए
वह जले या बुझ भी जाए, उस अगन से क्या ?

बन्दिशें ही बन्दिशें जब हों उड़ानों पर
पंछियों को फिर परों से या गगन से क्या ?

आपके घर में हवा है और ताज़ा है
आपको माहौल की गहरी घुटन से क्या ?

ज़हनियत का भी पता देते हैं खुद कपड़े
ज़हनियत मर जाए तो फिर तन-बदन से क्या ?

जब गरीबों का कहीं कोई न अपना हो
मुल्क की सारी व्यवस्था से सदन से क्या ?

जो अँधेरों की तरफदारी में शामिल हो
वह किरन भी हो अगर तो उस किरन से क्या ?

-कमलेश भट्ट कमल

1 comment:

"जाटदेवता" संदीप पवाँर said...

बेहतरीन लिखा है, अच्छे शब्द लेख में बिल्कुल सही कहा/बताया है