Monday, April 18, 2005

एक चादर–सी

एक चादर–सी उजालों की तनी होगी
रात जाएगी तो खुलकर रोशनी होगी।

सिर्फ वो साबुत बचेगी ज़लज़लों में भी
जो इमारत सच की ईंटों से बनी होगी।

आज तो केवल अमावस है‚ अँधेरा है
कल इसी छत पर खुली–सी चाँदनी होगी।

जैसे भी हालात हैं हमने बनाये हैं
हमको ही जीने सूरत खोजनी होगी।

बन्द रहता है वो खुद में इस तरह अक्सर
दोस्ती होगी न उससे दुश्मनी होगी।

–कमलेश भट्ट कमल

4 comments:

Anonymous said...

आज तो केवल अमावस है‚ अँधेरा है
कल इसी छत पर खुली–सी चाँदनी होगी।
kya bat hai ! kamalesh ji! bahut hi sunder abhvyakti hai.
Dr.Sadhna singh, J & K

Anonymous said...

kamlesh Uncle Aapki kavitayen mujhe bahut achchi lagati hain. kya aapne bachchon ke liye bhikuch likha hai. kahani ya aur kuch....?
net per use bhi dein to bahut achcha lagega.
shubham singh, jaipur

Shubham Singh,Jabalpur said...

Sir,
Aapki is kavita par to mera hriday prasann ho gaya aap jaise log hi Hindi Sahitya ka naam ooncha rakhte hain.
Isi tarah kavitaaen likhte rahie.

प्रभाकर पाण्डेय said...

दम है आपकी लेखनी में.आपकी रचनाएँ हिंदी को नई ऊँचाइयाँ दे रही हैं ।