Saturday, April 23, 2005

हाइकु

कौन मानेगा
सबसे कठिन है
सरल होना.


 

फूल सी पली
ससुराल में बहू
फूस सी जली.



हज़ार हाथों
वृक्षों ने की दुआएँ
हमने नहीं।


दोनों तय हैं
अँधेरे का छँटना
भोर का होना।


कौन–सी खुशी
उजागर करते
रोज फव्वारे।


दहला गयी
मौन बैठे ताल को
नन्हीं कंकरी।


धूल ढँकेगी
पत्तों की हरीतिमा
कितने दिन।


पल को सही
तोड़ा तो जुगुनू ने
रात का अहं।


हरेक दुखी
दुखियारे जग में
कौन है सुखी।


गगन में ही
कब तक उड़ेंगे
धरा के पंक्षी।


तोड़ देता है
झूठ के पहाड़ को
राई–सा सच।


आते ही आते
तानाशाह सूर्य ने
दिए बुझाए।


मर जाएँगे
हरियाली के साथ
हम सब भी।




















2 comments:

Anonymous said...

kamlesh ji bahut gahri bat kah jate hain aap apni kavitaon main--- "Tod deta hai/ jhuth ke pahad ko/ rayi sa sach" sab kuch kah diya aapne itane kam shabdon main. wah !! bahut hi sunder.
Ramnika sen, mizoram

bipin said...

behad pasand ayee.